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वो एक ही चेहरा तो नहीं [ Status For Hindi Satendra Baba

Status For Hindi

 


वो एक ही चेहरा तो नहीं

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘सत्या’ को बुलाया जाए।

किसी ने शिक्षक से पूछा

किसी ने शिक्षक से पूछा – क्या करते हो आप ??
शिक्षक का सुन्दर जवाब देखिए-
सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।
नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।।
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी ।
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ ।।
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के ।
और
 मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ ।।
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा ।
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ ।।

परखना मत,

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता
हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता
तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता
मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता
कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है
ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता

तन्हाइयों ने तोड़ दी

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया
कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया
तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना
आईना बात करने पे मज़बूर हो गया
सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

समझौतों की भीड़ -भाड़ में

समझौतों की भीड़ -भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया
देख शिकारी तेरे कारन एक परिंदा टूट गया
पत्थर का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेलिन शीशा
घर का बोझ उठाने वाले ब्च्चे की तक़दीर न पूछ
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया
किसको फ़ुर्सत [1]इस महफ़िल में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देख के लेकिन चूड़ी वाला टूट गया
पेट की ख़ातिर फ़ुटपाथों पे बेच रहा हूँ तस्वीरें
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया
ये मंज़र[2]भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है अच्छा-ख़ासा टूट गया

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली
तुम मुहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली
उस ने देखा बड़ी इनायत से
आँखों आँखों में बात भी कर ली
आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली
हम नहीं जानते चिराग़ों ने
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली
धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली

कहीं पुकार न ले

जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं
मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है
मुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं
मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुत
मुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं
कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूत
किसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं
न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है ये
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं

हर तरफ़ भागते दौडते

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी
हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी
ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी

तुम्हारी बात थी

अगर देखूँ तेरे अनुसार तो अच्छा नही लगता
सहज ही आ मिले जो प्यार तो अच्छा नही लगता
अहिल्या को पुरुष ही शाप दे पत्थर बनाता है
पुरूष ही कर रहा उद्धार तो अच्छा नही लगता
पनीली आँख मे इक शून्य ठहरा हो तो अच्छा है
गरीबी यदि दिखे ख़ुद्दार तो अच्छा नही लगता
ख़ुदी बीमार हूँ तो एक तिनका भी नही उठता
मगर नौकर रहे बीमार तो अच्छा नही लगता
तुम्हारी बात थी इस वास्ते ख़ामोश हूं लेकिन
तुम्ही हमको कहो ग़द्दार तो अच्छा नही लगता
हमारी बादशाहत मे मनाही शब्द वर्जित है
करे कोई हमे इन्कार तो अच्छा नही लगता
लहू पीना मुसलसल है हमारी एक आदत -सी
सुनो, है आज मंगलवार तो अच्छा नहीं लगता
गुलाबों को मैं चूमूँ या मसल दूं है मेरी मर्जी
गवाही में खड़े हों ख़ार तो अच्छा नहीं लगता


मेरे जीने का ज़रिया हैं

मैं इन्साँ हूँ मगर शैतान से पंजा लड़ाता हूँ
जहाँ मैं पाँव रखता हूँ वहीं फ़ितने उठाता हूँ
मेरे जैसा भी क्या खूँखार कोई जानवर होगा
मुझे जो प्यार करता है उसी को काट खाता हूँ
मेरी हस्ती दिखावा है छलावा ही छलावा है
मैं दिल में ज़हर रखता हूँ लबों से मुस्कराता हूँ
मेरा मज़हब तो मतलब है मस्जिद और मन्दिर क्या
मेरा मतलब निकलते ही ख़ुदा को भूल जाता हूँ
मेरे जीने का ज़रिया हैं सभी रिश्ते सभी नाते
मेरे सब काम आते हैं मैं किस के काम आता हूँ
मेरी पूजा-इबादत क्या सभी कुछ ढोंग है यारो
फ़क़त जन्नत के लालच में सभी चक्कर चलाता हूँ
मुझे रहबर समझते हो तुम्हारी भूल है सत्या’
मुझे मिल जाए मौक़ा तो वतन को बेच खाता हूँ
लेखक सतेंद्र बाबा

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